डॉक्टर बेटे से मां ने पूछा- तुम ही क्याें, वह इतना ही कह पाया मैं नहीं ताे और काैन?


मैं एक महीने से घर नहीं गया, हाॅस्पिटल में रहकर काम कर रहा हूं। मां पूछती है कि तुम ही क्याें? उनके इस सवाल का मेरे पास काेई जवाब नहीं हैं, मैं सिर्फ इतना ही कहता हूं कि मैं नहीं ताे और काैन निभाएगा यह जिम्मेदारी? ये कहना है चिरायु के पल्माेनरी मेडिसिन एंड क्रिटिकल केयर डिपार्टमेंट के एचओडी डाॅ. कृष्णाजीत सिंह का। शनिवार काे यहां से काेराेना के 28 मरीज ठीक हाेकर घराें काे गए। इस पर डाॅ. सिंह का कहना है कि आप भले इसे सफलता कह लें, लेकिन मेरे लिए यह तभी सफलता हाेगी जब यहां भर्ती काेराेना के 200 से ज्यादा मरीज स्वस्थ हाेकर जाएं।


उन्होंने बताया कि काेराेना के पेशेंट काे इलाज से ज्यादा सपाेर्ट की जरूरत हाेती है। सवालाें के जवाब देकर उन्हें संतुष्ट कर पॉजिटिव साेच काे डेवलप करनी हाेती है ताकि उन्हें भराेसा रहे कि वे ठीक हाे जाएंगे। क्याेंकि काेराेना काे लेकर समाज में जाे साेच बन गई है उससे व्यक्ति डरा हुआ है कि अगर काेराेना हाे गया है ताे अब ठीक नहीं हाे पाएंगे। डाॅ. सिंह का कहना है कि युवाओं के मुकाबले बच्चे और बुजुर्गाें का इलाज करना ज्यादा आसान है। बच्चाें के साथ उनके परिजन हाेते हैं, जबकि बुजुर्गाें काे जाे भी बताया जाए वे आसानी से स्वीकार लेते हैं। उनकी एक ही लालसा हाेती है कि बस ठीक हाे जाएं। जबकि, युवाओं ने पहले से बीमारी के बारे में बहुत कुछ सुन हुआ है। पहले उनके बहम दूर करने हाेते हैं, इसके अलावा वे ऑनलाइन जाे भी पढ़ते हैं उसके बाद सवाल पूछते हैं उससे भी निगेटिविटी आती है उसे दूर करना भी जरूरी हाेता है।


पांच महीने का बेटा है इसलिए एक महीने से नहीं गया घर

डाॅ. सिंह ने बताया कि उनका पांच महीने का बेटा है, उसे संक्रमण न हाे इस कारण वे एक महीने से घर नहीं गए हैं। रात में वीडियाे काॅलिंग के जरिए बेटे की सूरत देख लेते हैं। वे महीनेभर से टुकड़ाें-टुकड़ाें में तीन से चार घंटे ही साे पाते हैं। दिनभर मास्क और जूते पहनने के कारण कान के पीछे और पैराें में छाले पड़ गए हैं।

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